भारत के इतिहास में एक समय ऐसा भी था जब “सती प्रथा” जैसी अमानवीय कुप्रथा समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी थी। इस प्रथा के अंतर्गत, जब किसी महिला का पति मर जाता था, तो उसे भी ज़बरदस्ती या सामाजिक दबाव में उसके पति की चिता पर जीवित जला दिया जाता था। इस क्रूर परंपरा को “सह-मरण” या “सती” कहा जाता था।
🔴 सती प्रथा की दर्दनाक प्रक्रिया:
पति की मृत्यु के बाद विधवा को एक कटोरा भांग या धतूरा जैसी नशीली चीजें पिलाकर उसे बेहोशी जैसी हालत में पहुंचा दिया जाता था। जब वह श्मशान की ओर जाती थी, तो कभी हँसती, कभी रोती और कभी रास्ते में जमीन पर लेटकर सोने की कोशिश करती — यह नशे और डर का असर होता था।
चिता पर बैठाने के बाद उसे कच्चे बांस की मचिया (ढांचा) से दबाकर रखा जाता था ताकि वह जलने के समय उठकर भाग न सके। फिर चिता पर अत्यधिक राल, घी और लकड़ियां डाली जाती थीं जिससे आग तेज़ी से फैले और धुआं इतना गाढ़ा हो कि कोई चीख-पुकार सुन न सके। ढोल, शंख, करताल आदि बजाए जाते थे ताकि उसकी चीखें समाज तक न पहुँच पाएं।
यह सब सामाजिक सम्मान, धार्मिक आस्था और स्त्री के “पवित्र” होने की झूठी धारणा के नाम पर किया जाता था।
🟢 राजा राममोहन राय का संघर्ष:
सती प्रथा को समाप्त करने में राजा राममोहन राय का योगदान अतुलनीय है। उन्होंने 1812 में इस प्रथा के खिलाफ बोलना शुरू किया और कई विधवाओं को सती होने से बचाया। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से बार-बार अपील की कि इस अमानवीय प्रथा पर कानूनन रोक लगाई जाए।
उनके निरंतर प्रयासों के बाद 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिंक के समय “सती प्रथा निषेध अधिनियम” पारित किया गया, जिससे यह प्रथा आधिकारिक रूप से भारत में समाप्त की गई।
⚖️ सामाजिक सुधार की मिसाल:
राजा राममोहन राय ने न केवल सती प्रथा को समाप्त करने का साहसिक कदम उठाया बल्कि उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और समानता के लिए भी आवाज़ बुलंद की। वे भारत के पहले बड़े सामाजिक सुधारक कहे जाते हैं।
📌 निष्कर्ष:
सती प्रथा का इतिहास हमें यह सिखाता है कि समाज में व्याप्त कुप्रथाएं कितनी भयानक हो सकती हैं। लेकिन साथ ही यह भी सिखाता है कि अगर कोई व्यक्ति दृढ़ संकल्प के साथ खड़ा हो जाए, तो वह अकेले भी बदलाव ला सकता है।
राजा राममोहन राय को कोटि-कोटि नमन, जिन्होंने स्त्री जाति को वास्तविक सम्मान दिलाने की राह खोली।










